Surah Kafirun Tafseer | सूरह काफिरुन नाज़िल होने की वजह |109

आज हम आप को Surah Kafirun Tafseer और उसका तर्जमा बताने वाले हैं उम्मीद है आप इस पोस्ट को पढ़ कर दूसरों तक भी पहुॅचायेंगे।

आस्लामु अलैकुम, उम्मीद है के आप खैरो आफियत से होंगे जैसा के आप सभी को पता है के इल्मे दीन सीखना हर बालिग मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज़ है तो हमें भी चाहिए के हम भी इल्मे दीन सीखे और दूसरों को सिखाये।

Surah Kafirun Tafseer | सूरह काफिरुन नाज़िल होने की वजह

{قُلْ یٰۤاَیُّهَا الْكٰفِرُوْنَ: तुम फरमाओ ऐ काफ़िरों :} कुरैश की एक जमात ने ताजदार-ए-रिसालत ﷺ से कहा कि आप हमारे दीन की पैरवी कीजिए हम आपके दीन की पैरवी करेंगे। एक साल आप हमारे माबूदों की इबादत करें एक साल हम आपके माबूद की इबादत करेंगे। रसूले करीम ﷺ ने उनसे फरमाया, “इस बात से अल्लाह ताला की पनाह कि मैं उसके साथ उसके गैर को शरीक करूं।” लुफ़्फ़ार् कहने लगे तो आप ऐसा कीजिए कि हमारे किसी माबूद को हाथ ही लगा दीजिए हम आपकी तस्दीक़ कर देंगे और आपके माबूद की इबादत करेंगे। इस पर यह सुरह मुबारका नाज़िल हुई और सरकार-ए-दो आलम ﷺ मस्जिद-ए-हराम में तशरीफ लेगये، वहाँ कुरैश की वो जमात मौजूद थी जिसने नबी करीम ﷺ से यह गुफ्तगू की थी। हज़रत पुर नूर ﷺ ने यह सूरत उन्हें पढ़ कर सुनाई तो वह मायूस हो गए और उन्होंने हुज़ूर ए अकदस ﷺ को और हुज़ूर पुर नूर ﷺ के सहाबा-ए-किराम रदियअल्लाहु अन्हु को अज़ीयातें पहुँचाना शुरू कर दीं। याद रहे कि इस आयत में वो कुफ़्फ़ार मुराद हैं जो अल्लाह ताला के इल्म में ईमान से महरूम थे और कुफ़्र पर ही मरने वाले थे। (ख़ाज़िन, कुल या अय्युहल अलक़ाफिरून )


इससे चंद बातें मालूम हुई

(1) कुफ़्फ़ार से दिनी सुलह हराम बल्के कई सूरतों मे कुफर है

(2) कुफ़्फ़ार के बुतों और उनके मजहबी अय्याम की क़बिले तज़िम् समझते हुए उनकी तज़िम् करना कुफ्र है

(3) मोमिन के दिल में कुफ़्फ़ार की हैबत नही होनी चाहिए

(4) कुफ़्फ़ार को शरई उज़र के बगैर अच्छे अलक़ाब से याद ना किया जाए

(5) काफिर को बवक़्त जरूरत मौक़ा महल के मुनासिब से काफिर कहना दुरुस्त नलके अस्लुबे कुरानी के मुवाफिक है

{وَ لَاۤ اَنَا عَابِدٌ مَّا عَبَدْتُّمْ: और ना में उसकी इबादत करूँगा जिसे तुमने पूजा } इससे चंद बातें मालूम हुई

(1) इंसान दुनियवि मामिलात मे नरम हो मगर दीन में इंतिहाई मजबूत हो ताके कुफ़्फ़ार उससे मायूस हो

(2) हुज़ूर ए अकद्दस् ﷺ को अपने मुस्तकबिल की खबर थी के वो कभी कुफर शिर्क और फिस्क नही कर सकते

(3) मुसलमान को चाहिए के अपने बारे मे कुफ़्फ़ार को मायूस कर दे के वो उस दिन से फिर सके

{وَ لَاۤ اَنْتُمْ عٰبِدُوْنَ مَاۤ اَعْبُدُ : और ना तुम उसकी इबादत करने वाले हो जिसकी में इबादत करता हूँ} इससे मालूम हुआ के अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को लोगों के अच्छे बुरे खत्मे की खबर दिये कौन कुफ्र पर मरेगा और किसे इमान पर मौत आयेगी क्युंकि यहाँ कलाम उन कुफ़्फ़ार से हो रहा है जो कुफ्र पर मरने वाले थे

{لَكُمْ دِیْنُكُمْ وَ لِیَ دِیْنِ: تم : तुम्हारे लिए तुम्हारा दिन और मेरे लिए मेरा दिन } यानी तुम्हारे लिए तुम्हारा कुफ्र और मेरे लिए मेरी तोहीद और मेरा इखलास । इस कलाम से मकसूद कुफ़्फ़ार को डराना है ना के उनके कुफ्र से राजी होना है। ( सीरत उल जीनान)


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