Safar ki Dua | सफर की दुआ | Dua For Travel 1

अस्सलामु अलैकुम्, उम्मीद है के आप सभी खैरो आफियत से होंगे |आज हम आप को Safar ki Dua बताने वाले हैं उम्मीद है आप इस पोस्ट को पढ़ कर दूसरों तक भी पहुॅचायेंगे।

Safar ki Dua (सफर की दुआ)


سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هُذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ وَإِنَّا إِلَى رَبِّنَا لَمُنْقَلِبُونَ

सुब्हानल्लज़ी सख्खर लना हाज़ा वमा कुन्ना लहू मुक़रिनीन, व इन्ना इला रब्बीना लमुनक़लिबुन

Subhannallazi sakhkhar lana haza wama kunna lahu muqarinin, wa inna ila rabbina lamunqalibun


Safar ki Dua Ka Tarjuma

अल्लाह पाक है जिसने उसको हमारे कब्जा में दे दिया और उसकी कुदरत के बगैर हम उसे कब्जा में करने वाले ना थे और बिलशुभा हम को अपने रब की तरफ जाना है


Safar ki Dua | सफर की दुआ | Dua For Travel

सफर करने का सुन्नत तरीका 👇

जुमेरात के दिन सफर शुरू करना पसंदीदा (पसंद किया गया) है (बुखारी शरीफ)

2. सुबह सवेरे सफर करना मुबारक (बरकत का सबब) है (मिशकात शरीफ)

3. ज़ोहर के बाद सफर करना भी नबी करीम (सल्लल लाहु अलैहि वसल्लम) से साबित हैआप ने हज्जतुल विदा के सफर के लिए निकले थे तो उस सफ़र की इब्तिदा जोहर के बाद फरमाई (बुखारी शरीफ)

4. बेहतर है कि सफर से पहले कोई बेहतर रफीक़े सफर (साथी) तलाश कर लिया जाए ताकि वह जरूरत के वक्त मददगार और सामान की हिफ़ाज़त करने वाला हो

5. जब सफर में कई साथी हो तो बेहतर है कि उनमें जो शख्स सबसे ज्यादा समझ बूझ रखता हो उसे अमीर बना लिया जाए

6. सफर के लिए घर से निकलने से पहले 2 रकात नफ्ल पढ़ना मसनून हैनबी अकरम (सल्लल लाहु अलैहि वसल्लम) ने इरशाद फरमाया : घर से निकलते वक्त 2 रकात नमाज पढ़ लो तो सफर की तमाम ना पसंदीदा बातों से महफूज़ रहोगे (बुखारी शरीफ)

7. सफर में जाने वाले से दुआ की दरखास्त भी साबित है इसलिए कि मुसाफिर की दुआ कबूल होती है

8. अगर कोई दुश्वारियां या उज्र ना हो तो सफर में बीवी को साथ ले जाना मसनून है इसमें आसानी के साथ नफ्स की भी हिफाजत रहती है

9. जब काम पूरा हो जाए तो जल्द से जल्द सफर से वापस हो जाना चाहिए (बुख़ारी शरीफ़)

10. सफ़र से वापसी पर घर वालों के लिए कुछ तोहफा और हदिया लाना सुन्नत है12. वापस होकर मस्जिद में जाकर या अपने घर में 2 रकात नमाज पढ़ना सुन्नत है13. सफ़र से वापसी पर मुआन्क़ा (गले लगना) सुन्नत है


Safar ki Dua Padhne Ka Tarika :

हदीस: रसूल अल्लाह ﷺ जब सफर करते, तो सवार होकर तीन मर्तबा यह (दुआ) पढ़ते। जब सवारी पर पैर रखे, तो “बिस्मिल्लाह” पढ़ें। जब सवारी पर बराबर बैठ जाएं, तो “अल्हम्दुलिल्लाह” पढ़ें, फिर यह दुआ पढ़ें। इसके बाद तीन बार “अल्हम्दुलिल्लाह” और तीन बार “अल्लाहु अकबर” और एक बार “ला इलाहा इल्लल्लाह” कहें।”( मिश्कात्)


हदीस :

रावी कहते हैं कि मैंने हज़रत अली रदियअल्लाहु अन्हु को देखा कि उनके पास सवारी के लिए एक सवारी लाई गई। उन्होंने जब रकाब में पैर रखा तो “बिस्मिल्लाह” पढ़ा, जब सवारी की पीठ पर बराबर बैठ गए तो “अल्हम्दुलिल्लाह” पढ़ा, फिर यह दुआ पढ़ी: “सुब्हानल्लधी…” फिर तीन “अल्हम्दु” मद, “लिल्लाहिल्लाह” और तीन मर्तबा “अल्लाह मर्तबा” पढ़े।

उन्होंने कबीर पढ़ा, फिर यह दुआ पढ़ी… फिर आप हँसे, पूछा गया कि ऐ अमीरुल मुमिनीन! आपने किस बात पर हंसी फरमाई: मैंने रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ऐसा ही करते हुए देखा था जैसा मैंने किया, फिर उस के बाद अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हंसे, तो मैंने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आपने किस बात पर हंसी फरमाई?

तो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कहा कि तुम्हारा रब अपने बंदे से ख़ुश होता है, जब वह यह कहता है: ऐ मेरे रब! मेरे गुनाहों को बख्श दे। इस बात पर खुश होता है के मेरा बन्दा ये जनता है के मेरे अलावा कोई गुनाहों को बख्शने वाला नही है ( मिश्कात् )


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